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आदरणीय अकबर जी,

प्रणाम,

ईद मुबारक़. आप विदेश राज्य मंत्री बने हैं, वो भी ईद से कम नहीं है. हम सब पत्रकारों को बहुत ख़ुश होना चाहिए कि आप भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता बनने के बाद सांसद बने और फिर मंत्री बने हैं. आपने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा. उसके बाद राजनीति से लौट कर संपादक भी बने. फिर संपादक से प्रवक्ता बने और मंत्री. शायद मैं यह कभी नहीं जान पाऊंगा कि आप नेता बनकर पत्रकारिता के बारे में क्या सोचते थे और पत्रकार बनकर पेशगत नैतिकता के बारे में क्या सोचते थे? क्या आप कभी इस तरह के नैतिक संकट से गुज़रे हैं? हालांकि पत्रकारिता में कोई ख़ुदा नहीं होता लेकिन क्या आपको कभी इन संकटों के समय ख़ुदा का ख़ौफ़ होता था ?

अकबर जी, मैं यह पत्र थोड़ी तल्ख़ी से भी लिख रहा हूं. मगर उसका कारण आप नहीं है. आप तो मेरा सहारा बन सकते हैं. पिछले तीन साल से मुझे सोशल मीडिया पर दलाल कहा जाता रहा है. जिस राजनीतिक परिवर्तन को आप जैसे महान पत्रकार भारत के लिए महान बताते रहे हैं, हर ख़बर के साथ दलाल और भड़वा कहने की संस्कृति भी इसी परिवर्तन के साथ आई है. यहां तक कि मेरी मां को रंडी लिखा गया और आज कल में भी इस तरह मेरी मां के बारे में लिखा गया. जो कभी स्कूल नहीं जा सकी और जिन्हें पता भी नहीं है कि एंकर होना क्या होता है, प्राइम टाइम क्या होता है. उन्होंने कभी एनडीटीवी का स्टूडियो तक नहीं देखा है. वो बस इतना ही पूछती है कि ठीक हो न. अख़बार बहुत ग़ौर से पढ़ती है. जब उसे पता चला कि मुझे इस तरह से गालियां दी जाती हैं तो घबराहट में कई रात तक सो नहीं पाई.

वाजपेयी सरकार में मुरली मनोहर जोशी जी जब मंत्री थे तब शिक्षा के भगवाकरण पर खूब तक़रीरें करता था. तब आपकी पार्टी के दफ्तर में मुझसे कोई नफ़रत से बात नहीं करता था. डाक्टर साहब तो इंटरव्यू के बाद चाय भी पिलाते थे
अकबर जी, आप जब पत्रकारिता से राजनीति में आते थे तो क्या आपको भी लोग दलाल बोलते थे, गाली देते थे, सोशल मीडिया पर मुंह काला करते थे, जैसा मेरा करते हैं. ख़ासकर ब्लैक स्क्रीन वाले एपिसोड के बाद से. फिर जब कांग्रेस से पत्रकारिता में आए तो क्या लोग या ख़ासकर विरोधी दल, जिसमें इन दिनों आप हैं, आपके हर लेखन को दस जनपथ या किसी दल की दलाली से जोड़ कर देखते थे? तब आप ख़ुद को किन तर्कों से सहारा देते थे? क्या आप मुझे वे सारे तर्क दे सकते हैं? मुझे आपका सहारा चाहिए.

मैंने पत्रकारिता में बहुत सी रिपोर्ट ख़राब भी की है. कुछ तो बेहद शर्मनाक थीं. पर तीन साल पहले तक कोई नहीं बोलता था कि मैं दलाल हूं. मां-बहन की गाली भी नहीं देता था. अकबर सर, मैं दलाल नहीं हूं. बट डू टेल मी व्हाट शुड आई डू टू बिकम अकबर. वाजपेयी सरकार में मुरली मनोहर जोशी जी जब मंत्री थे तब शिक्षा के भगवाकरण पर खूब तक़रीरें करता था. तब आपकी पार्टी के दफ्तर में मुझसे कोई नफ़रत से बात नहीं करता था. डाक्टर साहब तो इंटरव्यू के बाद चाय भी पिलाते थे और मिठाई भी पूछते थे. कभी यह नहीं कहा कि तुम कांग्रेस के दलाल हो इसलिए ये सब सवाल पूछ रहे हो. उम्र के कारण जोशी जी गुस्साते भी थे लेकिन कभी मना नहीं किया कि इंटरव्यू नहीं दूंगा और न ऐसा संकेत दिया कि सरकार तुमसे चिढ़ती है. बल्कि अगले दिन उनके दफ्तर से ख़बरें उड़ा कर उन्हें फिर से कुरेद देता था.

अब सब बदल गया है. राजनीतिक नियंत्रण की नई संस्कृति आ गई है. हर रिपोर्ट को राजनीतिक पक्षधरता के पैमाने पर कसने वालों की जमात आ गई. यह जमात धुआंधार गाली देने लगी है. गाली देने वाले आपके और हमारे प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाए हुए रहते हैं और कई बार राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़े प्रतीकों का इस्तमाल करते हैं. इनमें से कई मंत्रियों को फालो करते हैं और कइयों को मंत्री. ये कुछ पत्रकारों को भाजपा विरोधी के रूप में चिन्हित करते हैं और बाकी की वाहवाही करते हैं.

निश्चित रूप से पत्रकारिता में गिरावट आई है. उस दौर में बिल्कुल नहीं आई थी जब आप चुनाव लड़े, जीते, फिर हारे और फिर से संपादक बने.

निश्चित रूप से पत्रकारिता में गिरावट आई है. उस दौर में बिल्कुल नहीं आई थी जब आप चुनाव लड़े, जीते, फिर हारे और फिर से संपादक बने. वो पत्रकारिता का स्वर्ण काल रहा होगा. जिसे अकबर काल कहा जा सकता है अगर इन गाली देने वालों को बुरा न लगे तो. आजकल भी पत्रकार प्रवक्ता का एक अघोषित विस्तार बन गए है. कुछ घोषित विस्तार बनकर भी पूजनीय हैं. मुझसे तटस्थता की आशा करने वाली गाली देने वालों की जमात इन्हें कभी दलाल नहीं कहती. हालांकि अब जवाब में उन्हें भी दलाल और न जाने क्या-क्या गाली देने वाली जमात भी आ गई है. यह वही जमात है जो स्मृति ईरानी को ट्रोल करती है.

आपको विदेश मंत्रालय में सहयोगी के रूप में जनरल वीके सिंह मिलेंगे जिन्होंने पत्रकारों के लिए प्रेस्टिट्यूडकहा. उनसे सहमत और समर्थक जमात के लोग हिन्दी में हमें प्रेश्याबुलाते हैं. चूंकि मैं एनडीटीवी से जुड़ा हूं तो 'एन' की जगह 'आर' लगाकर रंडी टीवीबोलते हैं. जिसके कैमरों ने आपकी बातों को भी दुनिया तक पहुंचाया है. क्या आपको लगता है कि पत्रकार स़ख्त सवाल करते हुए किसी दल की दलाली करते हैं? कौन सा सवाल कब दलाली हो जाता है और कब पत्रकारिता इस पर भी कुछ रौशनी डाल सकें तो आप जैसे संपादक से कुछ सीख सकूंगा. युवा पत्रकारों को कह सकूंगा कि रवीश कुमार मत बनना, बनना तो अकबर बनना क्योंकि हो सकता है अब रवीश कुमार भी अकबर बन जाये.

मै थोड़ा भावुक इंसान हूं. इन हमलों से ज़रूर विचलित हुआ हूं. तभी तो आपको देखकर लगा कि यही वो शख्स है जो मुझे सहारा दे सकता है. पिछले तीन साल के दौरान हर रिपोर्ट से पहले ये ख़्याल भी आया कि वही समर्थक जो भारत के सांस्कृतिक उत्थान की अगवानी में तुरही बजा रहे हैं, मुझे दलाल न कह दें और मेरी मां को रंडी न कह दें. जबकि मेरी मां ही असली और एकमात्र भारत माता है. मां का ज़िक्र इसलिए बार बार कह रहा हूं क्योंकि आपकी पार्टी के लोग एक मां की भावनाको सबसे बेहतर समझते हैं. मां का नाम लेते ही बहस अंतिम दीवार तक पहुंच कर समाप्त हो जाती है.

जब आप राजनीति से लौट कर पत्रकारिता में आते थे तो लिखते वक्त दिल-दिमाग़ पर उस राजनीतिक दल या विचारधारा की ख़ैरियत की चिंता होती थी? क्या आप तटस्थ रह पाते थे? तटस्थ नहीं होते थे तो उसकी जगह क्या होते थे?

अकबर जी, मैं यह पत्र बहुत आशा से लिख रहा हूं. आपका जवाब भावी पत्रकारों के लिए नज़ीर बनेगा. जो इन दिनों दस से पंद्रह लाख की फीस देकर पत्रकारिता पढ़ते हैं. मेरी नज़र में इतना पैसा देकर पत्रकारिता पढ़ने वाली पीढ़ी किसी कबाड़ से कम नहीं लेकिन आपका जवाब उनका मनोबल बढ़ा सकता है.

जब आप राजनीति से लौट कर पत्रकारिता में आते थे तो लिखते वक्त दिल-दिमाग़ पर उस राजनीतिक दल या विचारधारा की ख़ैरियत की चिंता होती थी? क्या आप तटस्थ रह पाते थे? तटस्थ नहीं होते थे तो उसकी जगह क्या होते थे? जब आप पत्रकारिता से राजनीति में चले जाते थे तो अपने लिखे पर संदेह होता था? कभी लगता था कि किसी इनाम की आशा में ये सब लिखा है? मैं यह समझता हूं कि हम पत्रकार अपने समय-संदर्भ के दबाव में लिख रहे होते हैं और मुमकिन है कि कुछ साल बाद वो ख़ुद को बेकार लगे लेकिन क्या आपके लेखन में कभी राजनीतिक निष्ठा हावी हुई है? क्या निष्ठाओं की अदला-बदली करते हुए नैतिक संकटों से मुक्त रहा जा सकता है? आप रह सके हैं?

मैं ट्विटर के ट्रोल की तरह गुजरात सहित भारत के तमाम दंगों पर लिखे आपके लेख का ज़िकर नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ व्यक्तिगत संदर्भ में यह सवाल पूछ रहा हूं. आपसे पहले भी कई संस्थानों के मालिक राज्यसभा गए. आप तो कांग्रेस से लोकसभा लड़े और बीजेपी से राज्यसभा. कई लोग दूसरे तरीके से राजनीतिक दलों से रिश्ता निभाते रहे. पत्रकारों ने भी यही किया. मुझे ख़ुशी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेसी सरकारों की इस देन को बरक़रार रखा है. भारतीय संस्कृति की अगवानी में तुरही बजाने वालों ने यह भी न देखा कि लोकप्रिय अटल जी ख़ुद पत्रकार थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपने अख़बार वीरअर्जुन को पढ़ने का मोह त्याग न सके. कई और उदाहरण आज भी मिल जायेंगे.

मुझे लगा कि अब अगर मुझे कोई दलाल कहेगा या मां को गाली देगा तो मैं कह सकूंगा कि अगर अकबर महान है तो रवीश कुमार भी महान है. वैसे मैं अभी राजनीति में नहीं आया हूं. आ गया तो आप मेरे बहुत काम आयेंगे. इसलिए आप यह भी बताइये कि पत्रकारों को क्या करना चाहिए. क्या उन्हें चुनाव लड़कर, मंत्री बनकर फिर से पत्रकार बनना चाहिए. तब क्या वे पत्रकारिता कर पायेंगे? क्या पत्रकार बनते हुए देश सेवा के नाम पर राजनीतिक संभावनाएं तलाश करते रहनी चाहिए? ‘यू कैन से सो मेनी थिंग्स ऑन जर्नलिज़्म नॉट वन सर!'

मैं आशा करता हूं कि तटस्थता की अभिलाषा में गाली देने वाले आपका स्वागत कर रहे होंगे. उन्हें फूल बरसाने भी चाहिए. आपकी योग्यता निःसंदेह है. आप हम सबके हीरो रहे हैं जो पत्रकारिता को धर्म समझ कर करते रहे मगर यह न देख सके कि आप जैसे लोग धर्म को कर्मकांड समझकर निभाने में लगे हैं. चूंकि आजकल एंकर टीआरपी बताकर अपना महत्व बताते हैं तो मैं शून्य टीआरपी वाला एंकर हूं. टीआरपी मीटर बताता है कि मुझे कोई नहीं देखता. इस लिहाज़ से चाहें तो आप इस पत्र को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. मगर मंत्री होने के नाते आप भारत के हर नागरिक के प्रति सैंद्धांतिक रूप से जवाबदेह हो जाते हैं. उसी की ख़ैरियत के लिए इतना त्याग करते हैं. इस नाते आप जवाब दे सकते हैं. नंबर वन टीआरपी वाला आपसे नहीं पूछेगा कि ज़ीरो टीआरपी वाले पत्रकार का जवाब एक मंत्री कैसे दे सकता है वो भी विदेश राज्य मंत्री. वन्स एगेन ईद मुबारक सर. दिल से.

आपका अदना,

रवीश कुमार





खुला पत्र लिखने वाले रवीश को पत्रकार निदा रहमानी का खुला पत्र

एनडीटीवी के रवीश कुमार की ब्रांडिंग सरोकारी पत्रकार की बनी है और न्यूज़रूम में रहते हुए भी अपने इस ब्रांडिंग को कायम रखने के लिए कभी वे टीवी स्क्रीन को काला करते हैं तो कभी पुलिस अधिकारियों को खुला पत्र लिखते हैं. लेकिन जब मामला अपनी बिरादरी का आता है तो अक्सर चुप्पी मार जाते हैं और यदि लिखते भी हैं तो स्पष्ट न लिखकर उसमें भाषाई कलाबाजी कर जाते हैं.इसी संदर्भ में रवीश कुमार की ही तर्ज पर उनको आईना दिखाते हुए सहारा की पत्रकार निदा रहमान ने फेसबुक पर उनको खुला पत्र लिखा है जिसमें पत्रकार बिरादरी के पत्रकारों के लिए आवाज़ उठाने के लिए कहा गया है. पूरा पत्र :

निदा रहमानी



रवीश कुमार के नाम खुला पत्र…….

आदरणीय रवीश जी

मुझे नहीं मालूम इस पत्र की शुरुआत कहां से करूं, बहुत दिन सोचने के बाद अब रहा नहीं गया इसलिए आपको ये खुला पत्र लिख रही हैं। खुला पत्र इसलिए क्योंकि आपके लिखे खुले पत्र पढ़ने के बाद मुझे यही सही तरीका लगा अपनी बात परेशानी और दर्द बयां करने का। आपको ये पत्र इसिलए भी लिख रही हूं क्योंकि आपसे उम्मीद कि आप दूसरे शोषित, परेशान,तबके की तरह हमारी समस्या के लिए भी आवाज़ उठाएंगे । मथुरा में जवाहर बाग कांड के बाद आपने ने पुलिस अधिकारियों- कर्मचारियों के नाम खुला पत्र लिखा तो उम्मीद जगी कि आप मीडिया संस्थान से जुड़े लोगों पर चुप नही रहेंगे। मैंने अपने तथाकथित पत्रकारिता जीवन के 12 साल एक राष्ट्रवादी संस्था सहारा इंडिया परिवार को दे दिए लेकिन आज मैं वहीं खड़ी हूं जहां से शुरुआत की थी, मैं बल्कि संस्था के सैंकड़ो कर्मचारी मेरे जैसे हालात में हैं । राष्ट्रीय सहारा को इस बरस 25 साल पूरे हुए हैं। लेकिन यहां अपनी ज़िंदगी देने वाले कर्मचारी आज राष्ट्रीय सहारा कैंपस के बाहर अपने बारह महीने का वेतन लेने के लिए धरने पर हैं। आप ही की तरह मुझे भी पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की खामोशी कचोटती है जिन्हें अपने ही तरह के लोगों का दर्द दिखाई नहीं दे रहा है। इतना भयंकर सन्नाटा और अंधेरा है कि डर लगता है कि हमने कहां अपना जीवन स्वाहा कर दिया। दूसरे के हक की बात करते करते हम अपने हक के लिए समर्थन नहीं जुटा पा रहे है।

एक हज़ार से ऊपर करे कर्मचारी दो सालों से परेशान हैं, वेतन नहीं मिलने के वजह से भूखे मरने की नौबत आ गई है,साथ काम करने वालों के बच्चों के नाम कट गए, कुछ अपना परिवार गांव छो आए , दर्जनों लोग लाखों रुपए के कर्ज में डूब गए और अब उनका कर्ज खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कोई हार्ट अटैक से मर गया किसी को लकवा मार गया । किसी ने बेटी की शादी के लिए घर बार बेंच दिया तो कोई अपने बच्चे की फीस नहीं दे पाने की वजह से स्कूल नहीं भेज रहा है। बच्चों की टाफी, खिलौने तो दूर उनका दूध तक बंद करना पड गया है। 12 महीने की वकाया वेतन के इंतजार में लोग समय से पहले बूढे हो गए हैं। प्रबंधन बार बार आश्वाससन देता है अब तो नौबत ये आ गई प्रबंधन कह रहा है काम करना है तो ऐसे ही करो वरना बाहर बैठो। सैंकड़ों कर्मचारी नौकरी छोड़ कर जा चुके हैं और जो हैं वो जून में खुले आसमान के नीचे बैठे हैं।

आपको ये पत्र लिखने का मकसद सिर्फ इतना कि शायद मीडियाकर्मियों , पत्रकारों के कानों पर जूं रेंगे। वैसे उम्मीद किसी से नहीं करनी चाहिए फिर भी आपकों ये खुला पत्र लिख रही हूं क्योंकि आप शायद चुप ना रहें। मुझे नहीं पता कि आपको हमारे साथियों की बदहाली के बारे में पता है या नहीं लेकिन एक कोशिश कर रही हूं आप तक अपनी बात पहुंचाने की । हम दूसरों के खबर बनाते रहे दिखाते रहे लेकिन देखिए ना हमने ज़िंदगी में ये कमाया कि कोई न्यूज़ चैनल हमारी खबर सुपर फीफ्टी या वीएसटी तक में नहीं चला रहा है, अखबारों में हम सिंगल कॉलम खबर तक नहीं हैं। जैसे आपको दो पुलिस अधिकारियों की शहादत पर बाकी पुलिस अधिकारियों की चुप्पी कचोट रही थी वैसे ही मझे भी मीडिया मेंकाम करनेवाले साथियों की खामोंशी काट रही है। क्योंकि जिन्होंने अपनी ज़िंदगी पत्रकारिता के नाम कर दी वो आज गुमनाम अंधेरे में मरने को हैं।

आदरणीय रवीश जी सवाल सिर्फ हमारे मुद्दे पर खामोशी का नहीं है बल्कि तमाम मीडिया संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों पत्रकारों के शोषण का भी है, दूसरों के हक का झंडा बुलंद करने वाले मीडिया कर्मी को कब कोई न्यूज़ चैनल या अखबार प्रबंधन बाहर का रास्ता दिखा देगा पता ही नहीं चलता है, जीवन में इतना डर तो फिर हम कैसे दूसरों को अधिकार दिलाने का दम भरतेहैं, जो अपने ही साथियों की बदहाली पर चुप है। किसी को फर्क नहीं पड़ रहा है कि हज़ारों कर्मचारी सड़क पर आ गए है। डर इस बात का है कि ये चुप्पी हम सबको एक एक कर निगल रही है। बिहार, उत्तराखंड, यूपी या किसी अन्य प्रदेश में पत्रकार या संवाददाता की हत्या पर तो बवाल मचता है, कुछ बड़े पत्रकार सोशल मीडिया पर भड़ास निकालते हैं, मामला ज्यादा बड़ा हो तो दिल्ली में विरोध प्रदर्शन हो जाता है लेकिन जब तमाम बड़े न्यूज़ चैनल और अखबार बिना किसी वजह के बेड पर्फोर्मेंस का हवाला देकर दर्जनों कर्मचारियों को एक साथ निकाल देते हैं तो ऐसा हंगामा क्यों नहीं होता है। आखिर इस चुप्पी की वजह क्या है,क्या रसूखदार मालिकों के सामने बोलने की हिम्मत आपमें और किसी और बड़े पत्रकार में नहीं है।

मुझे नहीं पता कि मेरा ये खुला पत्र आपके लिए या किसी और के लिए मायने रखता है या नहीं लेकिन हम सब उम्मीद लगाए हैं इस चुप्पी के टूटने की, क्योंकि लोगों ने जिस मीडिया को अपनी ज़िदगी दे दी वही मीडिया उनको अनसुना कर रहा है। हमारा होना ना होना किसी के लिए मायने नहीं रखता है शायद आपके लिए भी ना हो लेकिन जब आप मथुरा वाले मामले पर पुलिस अधिकारियों को उनकी चुप्पी पर खुला पत्र लिखते हैं तो मुझसे भी रहा नहीं गया, मैं एक छोटी सी मीडियाकर्मी जो अपने साथियों के साथ जूझ रही है अपने हक के लिए।

आशा है कि कोई ना कोई ये खुला पत्र आप तक पहुंचा ही देगा और तब शायद आप भी हमारी हिम्मत और हौसला बढ़ाए क्योंकि हम जो लड़ाई लड़ रहे हैं वो कल किसी और की भी हो सकती है।



निदा रहमानी

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