0
स्वप्न में आओ सुहृदता से भरे !
(मधुगीति )

स्वप्न में आओ सुहृदता से भरे, जागरण में ज्योत्सना ढाले हुए:
सुषुप्ति में अचेतन स्फुर करे, अचेतन निष्क्रिय तुरीयत मन करे !

चेतना की लाँघ सीमा ले चले, द्योतना की दिव्य आभा दे चले;
दीप्ति से संतृप्त उर झँकृत किए, श्रीति के सुर से धरा भास्वर किए !
रहें ना अब दूरियाँ दरम्यान में, तीर ना बाक़ी रहें मन म्यान में;
मयस्सर तुमरे मनों के यान हों, ध्यान के बाक़ी नहीं सोपान हों !

प्राण मिल जाएँ रचयिता छन्द में, वसीयत पाएँ प्रणव स्पन्द में;
सुरभि पहुँचे समूचे बृह्माण्ड में, अण्ड के हर पिण्ड के अणु-ध्यान में !
पुरुष पाकर परम की सौग़ात प्रति पल, युगों के व्यवधान को कर चले धूमिल;
'मधु' महके अवनि की गोधूलि निर्मल, सगुण की दहलीज़ पर छाएँ सवेरे !

Post a Comment Blogger Disqus

 
Top