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अवस्था चार मन रहा आता !

(मधु गीति १६०७१५)

अवस्था चार मन रहा आता,
जागृति स्वप्न सुषुप्ति रहता;
तुरीय अवस्थित अंत होता,
समाधि निर्विकल्प तब पाता !

सचेत रहता जागृति चेतन मन,
सचेष्ट रहता स्वप्न अवचेतन;
गौण चेतन औ अचेतन होते जब,
सुषुप्ति गहता तभी मानव मन !

अचेतन रह सचेत प्राण रहे,
बाद में वो भी निष्क्रिय भाव गहे;
तुरीय मन का यही है स्तर,
सत्ता सविकल्प रहे समयान्तर !

परे जब विकल्पों के वह होता,
नियंत्रित मन के तालों को करता;
जाता वह लाँघ सगुण की सीमा,
निर्गुणी भाव लिये वह पकता !

ध्यान तब निर्विकल्प हो जाता,
रिश्ता भव तन्त्र में सूक्ष्म होता;
मधुजग रहते हुए ना रहता,
पात्र औ देश काल हद तरता !

रचयिता: गोपाल बघेल मधु

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