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प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई !

(मधुगीति १६०७२३ अ)

प्रभु प्रभाव प्रति जीव सुहाई;
देश काल एकहि लग पाई !
पृथ्वी एक, देश सब अपन;
विश्व बसहि, मानस उर अन्तर !

भेद प्रकट मन ही ते होबत;
भाव सबल आत्मा संचारत !
बृह्म भाव आबत जब सुलझत;
खुलत जात ग्रंथिन के घूँघट !

चक्र सुदर्शन-चक्र चलाबत;
आहत होत द्वैत मति भागत !
नेह सनेह प्रकट होइ जाबत;
जगत लिए गति अन्तस भावत !

कर्म करत डर ना तब लागत;
सेवा भाव सबहि होइ जाबत !
'मधु' प्रिय लागत, माधुरि आबत;
गुरु सकाश आकाश सुहाबत !

रचयिता : गोपाल बघेल 'मधु'


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