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प्रो. भीमसिंह
जम्मू-कश्मीर पर 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान की ओर से कबायलियों का आक्रमण हुआ, जिसका जम्मू-कश्मीर की सेना और जम्मू-कश्मीर के लोगों ने जमकर मुकाबला किया। पाकिस्तान का जम्मू-कश्मीर को हड़पने का इरादा जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारत सेना के साथ मिलकर नाकामयाब कर दिया, परन्तु फिर भी पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के युद्धविराम के बावजूद भी जम्मू-कश्मीर के गिलगित-बल्तिस्तान के 32000 वर्गमील भूमि पर अवैध अधिपत्य जमा लिया जो भी आज भी जारी है। राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव में 13 अगस्त, 1948 को साफ-साफ आदेश दिया गया था कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के सभी अधिकृत भूमि को खाली कर दे। पाकिस्तान ने केवल 4500 वर्गमील भूमि को जो जम्मू प्रदेश का क्षेत्र था मीरपुर से मुजफ्फराबाद तक आजाद कश्मीर का दर्जा देकर जम्मू-कश्मीर की बाकी 32000 वर्गमील अधिकृत भूमि गिलगित-बल्तिस्तान का हिस्सा है, उसे पाकिस्तान के साथ मिला दिया, जिसको पाकिस्तान ने 2009 में एक प्रांत घोषित कर दिया था। त्रासदी यह है कि भारतीय रक्षा मंत्री कृष्णामेनन के बाद भारत की इस आवाज को कि जम्मू-कश्मीर की समस्या है क्या, विश्व के समक्ष नहीं रखा।
त्रासदी यह है कि भारत ने जिस गम्भीरता और आत्मविश्वास के साथ जम्मू-कश्मीर की समस्या को विश्व के समक्ष रखना था नहीं रख सका और आज भी जब आरएसएस समर्थित भारत सरकार दिल्ली में बहुसंख्यक शक्ति से राज चला रही है, उसे भारत की एकता और अखंडता की मजबूती के लिए और भारत की विदेश नीति को मजबूत बनाने के लिए जो कदम उठाने थे नहीं उठा सके। जम्मू-कश्मीर में आंतरिक विवाद ज्यादा परेशानी की वजह है और इसका कारण एक है कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने बाकी 577 शासकों की तरह भारत से विलय किया था। इस विलय को पाकिस्तान या कोई भी विदेशी शक्ति झुठला नहीं सकती थी, लेकिन महाराजा हरिसिंह के विलय को भारत के नेताओं ने यानि भारतीय संसद ने खुद रोक लगाकर रखी है और इस्तेमाल किया है संविधान में एक अस्थायी प्रावधान लगाकर वह है धारा-370 जो राष्ट्र की रक्षा के लिए एक खतरनाक मामला बनकर रह गया है।  
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को भारत से विलय किया। बड़ौदा के महाराजा ने 1948 में विलय किया, जबकि हैदराबाद और जूनागढ़ के रजवाड़ों ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर ही नहीं किये थे। 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान पूरे देश पर लागू हुआ और 577 राज्यों (रियासतें) इत्यादि भारतीय गणराज्य के स्थायी हिस्सेदार बन गये। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने विलय के उसी प्रारूप पर अपने हस्ताक्षर 26 अक्टूबर, 1947 को कर दिये और जम्मू-कश्मीर से खुद जलावतन भी हो गये। प्रश्न उठता है कि जब 577 राज्यों को भारत संघ में जोड़ दिया, जिनमें दो रियासतों के शासकों ने हस्ताक्षर भी नहीं किये थे। जम्मू-कश्मीर को अलग क्यों रखा गया, इसे भारत के संविधान में शामिल क्यों नहीं किया गया और जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान में अस्थायी प्रावधान धारा-370 लगाकर भारतीय संविधान से अलग कर दिया? 67 वर्ष गुजर चुके हैं, परन्तु अस्थायी स्वरूप नहीं बदल सका। जम्मू-कश्मीर में महाराजा हरिसिंह के बनाये हुए 1939 के संविधान का विस्तार करके 1956 को जम्मू-कश्मीर पर एक तथाकथित संविधान लादकर रख दिया।
जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारत की परम्पराओं, संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता को जमकर निभाया, जबकि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ हमेशा खिलवाड़ करती रही। जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यह हुई कि जम्मू-कश्मीर को संविधान तो दे दिया, परन्तु उसमें मानवाधिकार का कोई उल्लेख ही नहीं है, जिन मानवाधिकारों को भारतीय के अध्याय-3 में बड़ी खूबसूरती से पेश किया गया है। जम्मू-कश्मीर तीन क्षेत्रों के संस्कृति और सभ्यता से जुड़े रहे हैं और चाहिए तो यह था कि तीनों क्षेत्रों को भारतीय संविधान के अन्तर्गत उनकी मान्यता के आधार पर मानवाधिकार और राष्ट्र में आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए थे।
हुआ क्या धारा-370 के नाम पर जम्मू-कश्मीर के लोगों का शोषण 67 वर्षों से हो रहा है और इस शोषण की जिम्मेदारी उन केन्द्रीय नेताओं पर रही है, जो दिल्ली में बैठकर जम्मू-कश्मीर के लोगों की आकांक्षाओं, मानवाधिकारों और भविष्य से खिलवाड़ करते रहे हैं। आज यह कहना स्पष्ट होगा कि जो आज जम्मू-कश्मीर में हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी भारत की संसद पर है कि वह जम्मू-कश्मीर के लोगों को आज भी मानवाधिकार क्यों नहीं प्रदान कर सकी। जम्मू-कश्मीर का हाईकोर्ट भी भारत के संविधान के पूरे दायरे में नहीं आता, जम्मू-कश्मीर का हाईकोर्ट जूडिकेचर नहीं है। जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारतीय संविधान की अध्याय-3 की मौजदूगी जम्मू-कश्मीर के संविधान में है ही नहीं। इसमें जम्मू-कश्मीर के लोगों का दोष क्या है?
जम्मू-कश्मीर में जो हालात लगभग चार सप्ताह से चल रहे हैं, वे कोई नहीं नए नहीं हैं, मैं स्वयं छठी कक्षा रामनगर के हाईस्कूल में पढ़ता था, तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने मुझे क्लासरूम से बाहर फेंकने का आदेश दिया था, क्योंकि शेख अब्दुल्ला के राज में मेरे पिताजी जो आईएनए (इंडियन नेशनल आर्मी) से सम्बंधित थे, जेल में बंद कर दिया था। मैंने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का क्लासरूम में एक लड्डू मारकर साबित किया था, जो शेख अब्दुल्ला खुद बांट रहे थे। आज तक मेरा प्रश्न एक ही रहा कि जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने भारत के साथ कानूनी रिश्ता जोड़ दिया विलयपत्र पर हस्ताक्षर कर दिये और इसका स्वागत शेख अब्दुल्ला ने स्वयं लाल चैक में अपने इन शब्दों से किया था भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में, ‘‘मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे जम्मू-कश्मीर ने भारत के साथ विलय करके भारत का दामन सम्भाल लिया है।‘‘ इसके बाद धारा-370 को लाकर हमारे नेताओं ने गलतियां की, परन्तु आज वे नेता हमारे बीच में मौजूद नहीं है, 50 वर्ष गुजर चुके हैं, पंडित जवाहरलाल नेहरू जी को हमने जुदा हुए, फिर भी हम उसी चैराहे पर क्यों खड़े हैं? कौन है जिम्मेदार आज के हालात का? जिस कश्मीर में तलवार या बंदूक का नाम तक नहीं था, आज वहां ये बंदूकें, ये तोपें, ये गोलाबारी कहां से हो रही है, इसे कौन ला रहा है और यह कैसे आ रही है, जबकि भारत के लगभग पांच लाख से ज्यादा सैनिक अपनी जान जोखिम में डालकर भारत की सीमाओं की रक्षा के लिए तत्पर हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि घाटी में हालात क्यों बिगडे , इसका उत्तर सिर्फ इतना है कि घाटी में हालात आज नहीं बिगडे, 1947 से बिगड़ते ही आये हैं, मर्ज बढ़ती गया, ज्यों-ज्यों दवा की। प्रश्न यह है कि मर्ज क्या था और दवा कौन सी थी? जम्मू-कश्मीर के लोग भारत से जुड़ना चाहते थे, आज भी जुड़ना चाहते हैं, परन्तु उन्हें मैं साफ शब्दों में कहूंगा रोकने के लिए अगर कोई भी जिम्मेदार है, वह भारत की संसद (पार्लियामेंट ऑफ इंडिया)। यह एक नई बात नहीं है कि कोई नौजवान गोली का शिकार हो जाता है तो उसको विदा करने के लिए लोगों की संख्या कितनी हो, परन्तु इसमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि कश्मीर कि वादी में लोग असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं, जबकि सरकार भी अपनी है, नेता भी अपने। यहां एक प्रश्न उठता है कि तीन 20 या 21 साल के लड़के एक घर में छुपे हुए थे या उनके हाथ में हथियार थे, क्या यह जानना जरूरी नहीं था कि इन किशोरों के पीछे कौन छुपा हुआ है, इनके पास हथियार कहां से आये या वर्षों तक सरकार को इसकी खबर तक नहीं हुई?  क्या इनको जिंदा पकड़ना भारत की सुरक्षा और मानवाधिकार की रक्षा के लिए अनिवार्य नहीं था? प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि केन्द्र सरकार जिसकी जम्मू-कश्मीर सरकार में पूरी-पूरी हिस्सेदारी है, उसकी भूमिका क्या रही है।
बहुत बड़ा प्रश्न है कि ऐसे हालात पैदा क्यों हुए? इसका सबसे बड़ा कारण है कि जम्मू-कश्मीर को 67 वर्षों में भारत के साथ संवैधानिक रूप से जोडा नहीं सका ? कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या कोई दूसरे दल जो भी भारत की संसद में 1950 से भूमिका निभा रहे हैं, उन सभी राजनीतिक दलों को पूरे भारत के लोगों के सामने सफाई देने की आवश्यकता है कि जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ रिश्ता क्या है? जम्मू-कश्मीर में अस्थायी धारा-370 संविधान में जोड़कर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग क्यों रखा गया, इसका राज क्या है? जम्मू-कश्मीर के लोगों को मानवाधिकार के दायरे से बाहर क्यों रखा गया? जम्मू-कश्मीर में वहां के हाईकोर्ट को भी भारत के संविधान में क्यों नहीं लाया गया। जम्मू-कश्मीर के लोगों को मानवाधिकार से वंचित क्यों रखा गया, जो भारतीय संविधान के अध्याय-3 में बाकी देश के सभी नागरिकों पर लागू हैं। 
ये प्रश्न हर भारतीय का है , चाहे वह जम्मू-कश्मीर से हो या कन्याकुमारी से, गुजरात से हो या नागालैंड से कि जम्मू-कश्मीर के इन हालातों का कैसे समाधान किया जा सकता है। इसका एक ही उत्तर है--धारा-370 में तुरंत संशोधन और तिरंगा और भारतीय संविधान ही एक समाधान है, ताकि जम्मू-कश्मीर के लोग भी गर्व से कहें कि हम हिन्दुस्तानी हैं और उन्हें मानवाधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा। धारा-370 में संशोधन--भारत एक है।
वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट एवं मुख्य संरक्षक, नेशनल पैंथर्स पार्टी
    (लेखक का ये निजी विचार है )


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