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सियासत की ग़ज़ल

सत्ता चलाए कौन, ये अधिकार कहां है,
बातों की सिर्फ जंग है, हथियार कहां है।
पतंग किसी के हाथ है, डोरी किसी के हाथ,
जो पेंच लड़ाता है, वो किरदार कहाँ है।


सत्ता की कुसिर्यों पे, है कब्जा अमीर का,
गरीबों का सिर्फ वोट है, सरकार कहां है।
राहों में कैसे लुट गया, अमन का कारवां,
रहजन की ये साजिश है, तो सरदार कहाँ है।


फांसी की सज़ा कल उसे, मुन्सिफ ने सुना दी,
मुकबर से पूछता है, गुनहगार कहाँ है।
जब मीडिया के लोग ही, पैसों में बिक गए,
सच को बयां करे, वो कलमकार कहाँ है।


कालेज में पनपने लगे, कांटे फसाद के,
तालीमों-अदब के वो, सरोकार कहाँ है।
हवाई किले तो, रोज ही बनते हैं ‘‘मुसाफिर’’,
बेकार नौजवां है, रोजगार कहाँ है।

ग़ज़ल (बूढ़ा आदमी)


मेरी हर शाखे़ तमन्ना, अजीब लगती है,
अधर में लटका हुआ सा, नसीब लगती है।
वफा की राह में दीवार, बनी है अकसर,
अपनी तक़दीर ही, अपना रकीब लगती है।


हमने हाथों की लकीरों को, जब पढ़ना चाहा,
हर तरफ से वो बड़ी, बदनसीब लगती है।
साठ सालों के बाद, दौर ऐसा आता है,
जिंदगी वक्त के जैसे, करीब लगती है।


जिंदगी हमको रूलाती है, हंसाती है कभी,
उम्र की ढलती घड़ी भी, अजीब लगती है।
नाती-पोतो में खेलती है, वो बचपन की तरह,
घड़ी दुलार की वो, खुशनसीब लगती है।


लम्बी राहों का सफर, होता है दुश्कर यारांे,
जहां हर राहें-वफा भी, अजीब लगती है।
हमसफर बनके चला, कौन ‘‘मुसाफिर’’ अपने,
यादें-मांझी की अदा भी, हबीब लगती है।

मुसाफिर देहलवी



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