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-प्रेमबाबू शर्मा

एक दौर जब टीवी पर सास भी कभी बहू थी,कहानी घर घर की, जैसे शो की लोकप्रियता के आगे कोई भी शो नही टिक पा रहा था,लेकिन बदलते समय के साथ टीवी ने भी करबट और अब एक बार फिर से धर्मिक सीरियलों का दौर रहा है।
 
 दूरदर्शन पर सबसे पहले रामायण, श्रीकृष्णा और फिर महाभारत ने रंग जमाया। साल 2011 में एकबार फिर रामायण का जबरदस्त दौर चला और इस बार चैबीस घंटे का माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव दूरदर्शन के जमाने से भी ज्यादा मजबूत रहा। दरअसल धर्म के जरिए टीवी रह रहकर समाज में अपने ताकतवर होने का अहसास कराता रहा है। 
 
अब एक बार फिर से अचानक बहुत सारे धार्मिक सीरियल फिर से टीवी पर धूम मचाने आ गए हैं। वजह यही है कि इसकी जडंे सिनेमा के मुकाबले ज्यादा मजबूत 

‘‘सिया के राम’ सीरियल स्टार प्लस चैनल पर खूब देखा जा रहा है। इसमें सीता के जीवन की कहानी है। सोनी टीवी पर ‘‘संकट मोचन महाबली हनुमान‘‘ और ‘‘सूर्य पुत्र कर्ण‘‘ बैक टू बैक टेलीकास्ट होने का बावजूद दिन ब दिन अपनी दर्शक संख्या बढ़ा रहे हैं। एंड टीवी चैनल पर ‘‘जय संतोषी मां‘‘ की टीआरपी लगातार परवान चढ़ रही है। स्टार गोल्ड पर पुरानी वाली महाभारत की महिमा का देश के ग्रामीण इलाकों में अब भी कोई तोड़ नहीं है। एपिक चैनल पर रामायण ने एक खास दर्शक वर्ग बना लिया है।
 
  डिस्कवरी किड्स पर लिटिल कृष्णा का एनिमेशन अवतार बच्चों में जबरदस्त धूम मचा रहा है। इसी चैनल पर किसना भी बच्चों को आकर्षित कर रहा है। तो, कार्टुन नेटवर्क पर रिटर्न्स ऑफ हनुमान जब बच्चे देखते हैं, तो उठने का नाम ही नहीं लेते। बच्चों के एक और चैनल पोगो पर दिख रहे छोटा भीम ने तो घर-घर में जगह बना ली है।
 
माना जा सकता है कि परंपरा और संस्कृति की कहानियों को अगर ताजा अंदाज में कहा जाए, तो किसी भी काल में दर्शक वर्ग बन ही जाता है। बात सही भी है कि हमारी जो परंपरा हजारों साल से चली आ रही है, दर्शकों पर उसका असर तो होता ही है। हमारे टीवी के परदे पर यह उसी असर का परिदृश्य है, जिसमें सीता, राम, हनुमान, संतोषी मां, कर्ण, कृष्ण और भीम फिर से बहुत चाव के साथ देखे जा रहे हैं। 
 
यह हमारे टेलीविजन का नया चेहरा है। जो सास बहू और रिश्तों के रंग से आजाद होकर एक बार फिर से धर्म के रंग में रंगता दिख रहा है। टीवी के धर्म के रंग में रंगने का यह तीसरा दौर है। सबसे पहले कोई 25 साल पहले रामायण,श्रीकृष्णा ने धूम मचाई थी। उसके तत्काल बाद टीवी पर महाभारत आई। वह पहला दौर था। दूसरा दौर आया सन 2009 के आखिर में शनिदेव की माहिमा,फिर 2011 में जब लाइफ ओके चैनल पर भगवान शिव पर आधारित ‘‘देवों के देव..महादेव‘‘ की शुरुआत हुई।
 
 जबरदस्त टीआरपी मिलने से लाइफ ओके के हौसले बुलंद हुए, तो तत्काल बाद लाइफ ओके पर कथा महादेव पुत्र बाल गणोश की भी आ गई थी।अभी कुछ दिन पहले ही रतन राजपूत और ग्रेसी सिंह मुंबई के एक मंदिर में संतोषी माता की महाआरती करती दिखीं। दोनों वहां माता का आशीर्वाद लेने आई थीं। रतन ने कहा -‘‘मैं अपने हाल ही मैं प्रसारित हुए शो को लेकर कुछ नर्वस हूं। धर्म और भगवान में मेरा विास है। इसलिए उम्मीद है कि हमारा यह सीरियल अच्छा चलेगा।‘‘ सन् 2001 की सुपरहिट फिल्म ‘‘लगान‘‘ में गौरी के किरदार से अचानक बहुत विख्यात हुई और बाद में पंद्रह साल तक लुप्त हो गई। ग्रेसी सिंह भी ‘‘संतोषी मां‘‘ में नजर आ रही हैं। ग्रेसी इसमें संतोषी माता के किरदार में हैं। रतन राजपूत भी अहम रोल में हैं। 
 
स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले सीरियल ‘‘सिया के राम’ के सेट की खूब र्चचा है। रावण के साम्राज्य के बाहरी हिस्सों की शूटिंग के लिए जल्द ही इस प्रोडक्शन की टीम श्रीलंका जाएगी। ट्रैंगल प्रोडक्शन्स की तरफ से बताया गया कि सीरियल की शूटिंग फिलहाल भारत में की जा रही है। कुछ हिस्सों की शूटिंग भुज में की गई है और जल्द ही इस टीम के लोग भूटान जाएंगे। इस सीरियल में जब रावण का घर दिखाया जाएगा, तो उसे प्रामाणिक लुक देने के लिए एक टीम श्रीलंका में शूटिंग करेगी। इस कथा को पहली बार मिथिला कुमारी सीता के दृष्टिकोण से दिखाया जा रहा है। इसमें मदिराक्षी सीता की भूमिका में है। लाइफ ओके पर देवों के देव महादेव लगातार तीन साल तक अपना रंग जमाए रहा। उस दौरान महादेव का किरदार निभाने वाले कलाकार मोहित रैना के दर्शन करने लोग उनके घर के बाहर जमा होते थे वे जहां भी जाते, लोग उनके पांव छूने लग जाते थे।
 
टीवी पर धर्म के इस तीसरे दौर के बारे में समाजशास्त्री डॉ. विजय शर्मा कहते हैं कि ‘‘बहुत सालों से लोग टीवी पर सास बहू के सीरियल देखकर ऊब गए थे। अब एक बार फिर से हमारी संस्कृति की पारंपरिक कथाएं नए स्वरूप में आ रही हैं, तो लोग तो देखेंगे ही। यही कारण है कि गीता, रामायण और महाभारत के किरदार अलग-अलग कहानियों के साथ फिर से पूरी धमक के साथ लौट आए हैं।‘‘ सफलता के सुर जब सिर चढ़कर बोलने लगते हैं, तो सुनने वाले भी मिल ही जाते हैं। यही कारण है कि सीता, राम, हनुमान, कर्ण और कृष्ण, सारे के सारे टीआरपी के मैदान में बाजी मारने को बेताब हैं। सही मायने में कहा जाए तो दुनिया में किसी भी देश के मुकाबले भारत में टीवी बहुत देर से आया है। हमारे देश में टीवी का वास्तविक विकास तो सिर्फ बीस-पच्चीस साल ही पुराना है। 
 
यह अभी-अभी जवान हुआ है। टेलीविजन के असली विकास की शुरुआत को अभी लगभग ढाई दशक का समय भी नहीं बीता लेकिन टीवी आज सबसे ज्यादा और गहरे असरकारक माध्यम के रूप में हमारे सामने है। आज किसी को भी अपनी बात कहनी हो, तो टीवी सबसे व्यापक, सबसे तेज और सबसे असरकारक माध्यम है। तब, जब हमारे देश में सिर्फ दूरदर्शन ही हुआ करता था, तब से ही रामायण और महाभारत के दौर में इसकी भनक मिल गई थी। इसी कारण धार्मिक सीरियल रह रहकर मजबूती के साथ सामने आते रहे हैं।पच्चीस साल पहले जब दूरदर्शन पर रामायण सीरियल आया था तो लोग उस समय टीवी के सामने दिया जलाकर, फूल चढ़ाने के साथ जूते-चप्पल उतारकर सीरियल देखते थे और सीरियल की समाप्ति पर आरती के बाद प्रसाद भी बांटा करते थे। 
 
बी.आर. चोपड़ा के महाभारत के कृष्ण नीतीश भारद्वाज को तो गांवों में लोग भगवान का अवतार ही मानते थे। टीवी धारावाहिक निर्माता धीरज कुमार की बात बिल्कुल सही लगती है कि ‘‘आज के पेरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चे धार्मिक धारावाहिक देखें और उनसे संस्कार लेने के साथ अच्छी बातें भी सीखें। इसलिए धार्मिक धारावाहिक कुछ-कुछ अंतराल के बाद अलग-अलग रूप में अवतरित होते रहे हैं।‘‘ सोनी, कलर्स, जी, स्टार प्लस और ऐसे ही मुख्यधारा के चैनलों की तो छोड़िये, काटरून नेटवर्क, पोगो, सोनिक, डिज्नी, डिस्कवरी किड्स, जैसे चैनल भी इसी धारा में बह रहे हैं, क्योंकि बच्चों को तो संस्कार और परंपरा की सीख वहीं से मिलेगी। 
 
जहां तक आम दर्शक की बात है तो वह आधुनिकता की दौड़ में सहभागी होने के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहना ज्यादा पसंद करता है। यही देखकर टीवी के परदे का ताजा परिदृश्य देखें, तो सच्चाई यही है कि ज्यादातर चैनल धर्म के रंग की ऐसी कहानियां रच रहे हैं जिनसे समाज को प्रेरणा मिले और बच्चे, बड़े और बूढ़े हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ बदलाव आए। टीवी धारावाहिकों की फैक्टरी के नाम से मशहूर एकता कपूर की इस बात में दम है कि व्यक्ति चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, वह उस आधुनिकता को भी धर्म के अनुसार ही जीता है। क्योंकि संस्कार हमारे जीवन की जड़ें हैं और आपसी लड़ाई झगड़े हमारी दिनर्चया का हिस्सा। ये सारी चीजें साथ-साथ चलती हैं। यही वजह है कि टीवी के परदे पर अचानक बहुत रंग भर गई जिंदगी की कहानियों के बीच धर्म ने भी अपनी धमक फिर से बना ली है

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