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जयपुर,  विकास से संबंधी खबरों को मीडिया में स्पेस देना चाहिए। आज देश में गरीब और अमीर के बीच गहरी खाई दिखने लगी है, इसके पाटने के लिए विकास पत्रकारिता को मुख्यधारा की पत्रकारिता में लाना होगा। 


यह कहना था ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव और वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह का। वे राजस्थान विश्वविद्यालय के जन संचार केन्द्र एवं यूनीसेफ-राजस्थान के संयुक्त तत्वावधान में विवि के मानव संसाधन विकास केन्द्र के सेमिनार हॉल मंे आयोजित राष्ट्रीय संवाद के दौरान बोल रहे थे। 

 देश मे किसानों की बढ़ती आत्महत्या पर बोलते हुए एन के सिंह ने कहा कि किसानों को अपनी फसल का सही मुनाफा नहीं मिलता है, जिससेे देश में किसान कर्जे से त्रस्त है और आत्महत्या की ओर कदम उठाता है। देश में आजादी के बाद से अब तक कृषि में उत्पादन को बढ़ावा नही मिल पाया है, इस दिशा मे सरकार और वैज्ञानिकों की उदासीनता साफ नजर आती है। 
 
मीडिया संस्थानों मे संपादक की भूमिका पर जोर देते हुए एन के सिंह ने कहा कि संपादक चाहेे तो अपने अखबार या न्यूज चैनल के माध्यम से समाज की सोच में बदलाव ला सकता है। इसके लिए पत्रकारों को ग्रासरूट लेवल पर काम करना होगा। हालांकि आज मीडिया पर भी शिकंजा कसा जाने लगा है, मीडिया के काम पर पाबंदी लगाने के लिए 37 से अधिक कानून बनाये हुए, ऐसे में कई बार

पत्रकारों को खबरें लिखने से पहले डर महसूस होने लगता है। राज्य सभा टीवी के कार्यकारी निदेशक राजेश बादल ने कहा कि विकास करने के लिए समाज को साथ लेने की जरूरत है, ऐसे में मीडिया को अपने उदासीन रवैये को छोड़कर विकास की खबरों को प्रमुखता से उठाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश की आजादी के समय महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए कई कार्यक्रम हुए लेकिन 70 के दशक में ये कार्यक्रम हाशिए पर आ गए। उन्होने बताया कि 1980 के बाद विभागों का बजट तो बढ़ा लेकिन उनका काम सिकुड़ता गया जिसकी वजह से बीते 20 सालों मंे समाज में बदलाव देखने को मिल रहा है। अब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों में विकास पत्रकारिता को लेकर सार्थक पाठ्यक्रम बनाने की जरूरत है,जिससे तैयार होेने वाले नवोदित पत्रकार समाज की समस्याओं को उजागर कर सकें।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने पत्रकारों को समाज के विकास की धारा को करीब से देखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में सभी क्षेत्रों में काम हो रहा सिवाए विकास के। थानवी ने विकास पत्रकारिता के लिए मीडिया संस्थानों में अलग से बीट बनाने की बात कही। जो राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर के मीडिया संस्थानों में कहीं देखने को नहीं मिलती है। यूनिसेफ के कार्य की सराहना करते हुए थानवी ने कहा कि सही मायने में कुपोषित बच्चों के भविष्य को संवारने और शिक्षित करने के साथ साथ सही दिशा भी दिखा रहा है।


थानवी ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की बात करते हुए कहा कि विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। देश कृषि प्रधान है लेकिन पत्रकारिता में उसकी जगह हाशिये पर है। आज राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर के आने बाद कुएं खत्म होकर मॉल, हवाईअड्डा सहित कई बहुमंजिला इमारतें बन दैनिक भास्कर के संपादक एल पी पंत ने कहा कि पाठक का अपना चैनल और अपनी खबर है, अब संपादक के सामने चुनौती है कि वो पाठक को कैसे आकर्षित करें। 

विकास पत्रकारिता पर जोर देते हुए पंत ने कहा कि पत्रकारिता मे समय के साथ बदलाव होना जन संचार केन्द्र के अध्यक्ष प्रोफेसर संजीव भानावत ने बताया कि इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संवाद में देश के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षकों ने विकासात्मक पत्रकारिता के लिए समन्वित पाठ्यक्रम बनाने के लिए चर्चा की, जिसका उद्देश्य विकास पत्रकारिता को मीडिया की मुख्यधारा मे लाना है। प्रोजेक्ट समन्वयक कल्याण सिंह कोठारी ने देशभर से पधारे सभी वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया शिक्षकों का आभार प्रकट किया।

 इस मौके पर भोपाल से वरिष्ठ पत्रकार कमल दीक्षित, पंजाब विवि पटियाला स प्रो हरजिंदर बालिया, अंबेडकर विवि लखनउ से प्रो गोविंद जी पांडे, केन्द्रीय विवि शिचलर से जी पी पांडे, केन्द्रीय विवि हिमाचल प्रदेश से डॉ प्रदीय नायर, भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से प्रो आनंद प्रधान, वरिष्ठ मीडियाकर्मी वर्तिका नंदा, फिल्म सेंसर बोर्ड पूर्व सदस्य डॉ दुर्गेश त्रिपाठी, कोलकाता से उमाशंकर पांडे, नागपुर विवि से डॉ धर्मेश धावनकर, हरिदेव जोशी पत्रकारिता विवि जयपुर से प्रो नारायण बारेठ और मनोज लोढ़ा, कोटा खुला विवि से सुबोध अग्निहोत्री, आईआईएस से स्मिति पाडी ने विकास पत्रकारिता पर अपने विचार व्यक्त कियें।

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