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- प्रेमबाबू शर्मा 
 
बाॅलीवुड में इस तरह की फिल्मों की अनगिनत फिल्में बनी हैं आपकी फिल्म बेचारे बीवी के मारे किस तरह की फिल्म है ?
 
पहले बाॅलीवुड फिल्मों की कहानियां ऐसी कल्पना के आसपास बुनी जाती थीं, जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं होता था। पर अब दौर है रियल सिनेमा का। और यह ट्रेंड तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2015 में रिलीज हुई प्यार का पंचनामा 2 की अगर बात करें तो शादी  से पहले तीन दोस्तों की कहानी पर बेस्ड थी। 
 
तीनों दोस्त सच्चे प्यार की तलाश  में निकलते हैं पर जो कुछ उनके साथ होता है वह दर्शकों से छिपा नहीं है। प्यार का पंचनामा 2 में तो शादी  से पहले का किस्सा बयां किया गया है परंतु शादी  के बाद क्या कुछ होता है उस पर आधारित फिल्में भी खूब दर्शकों  ने पसंद की है। इनमें मुझे मेरी बीवी से बचाओ और शादी  के साइड इफेक्टस् जैसी फिल्में हैं इसी फेहरिश्त  में मेरी फिल्म बेचारे बीवी के मारे भी है।

आपकी यह फिल्म ‘‘बेचारे बीवी के मारे’’  इन दो फिल्मों की तुलना में किस तरह अलग है ?
 
फिल्म ‘‘बेचारे बीवी के मारे’’ ढेर सारे घटनाक्रमों के साथ आगे बढ़ती है। महिलाओं के लिए बनाए गए कानून ऐसे हैं कि उनका महिलाओं द्वारा कई बार प्रयोग कई बार दुरूपयोग भी किया जा रहा है। ऐसे में कई बार पुरुष बिना गलती के ही पेरषानी में फंस जाते हैं।
 
 खास बात तो यह है कि पुरुष अपनी शिकायत तक कहीं दर्ज भी नहीं करवा पाते। घर में बीवी व परिवार के बीच दो पाटों में पिसते रहते हैं। बीवियों के शक के शिकार होते हैं और उन्हें बार -बार अपनी सफाई देनी पड़ती है। कई बार वे गलत आरोपों में फंसा दिए जाते हैं। ऐसे में पुरुषों के लिए भी एक सेल होना चाहिए जिससे उन्हें सहायता मिल सके।

इस फिल्म की कहानी समाज के किस वर्ग पर फोक्सड है और इस फिल्म की अवधारणा आपको कहां से मिली ?    
 
बेचारे बीवी के मारे फोर्थ क्लास कर्मचारी से लेकर मंत्री तक की कहानी है। यह शादीशुदा जिंदगी के कई अनछुए पहलुओं को दिखाती। यह फिल्म वास्तविकता के धरातल पर इस तरह से बुनी हुई है कि इसे देखने के बाद दर्शक अपनी पीड़ा महसूस कर सकेगा।
 
 इस फिल्म का निर्माण एमजी 10 प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। मैं गुड़गांव के सरहौल गांव का रहनेवाला हूं और पेशे  से वकील हूं। दरअसल इस कारण इस तरह के मामलों से मेरा रोजाना सामना होता रहता है। महिलाएं यहीं से मेरे दिमाग में इस तरह की फिल्म के बारे  में आइडिया आया।

आपकी यह पहली फिल्म है। आपने अभिनय कहां से सीखा और थियेटर से कितना फायदा हुआ। अपने सहयोगी कलाकारों और बताइए कि  इस फिल्म के प्रति आप कितने आशावान  हैं ?
 
यह मेरी डेबू फिल्म है। मैंने थिएटर के साथ साथ पदमिनी कोल्हापुरे एक्टिंग स्कूल से अभिनय की शिक्षा ग्रहण की है। फिल्म को सोम वत्स ने निर्देशित किया है तथा इसके डॉयलॉग और कांसेप्ट लिखे हैं पुनीत द्विवेदी ने। मेरे अलावा अलावा इसमें मनोज बख्शी व ममता राणा अहम भूमिका में हैं। 
 
पांच गानों से सजी यह फिल्म एक फेमिली ड्रामा है। साथ ही  दर्शक  स्टार्ट टु एंड लाइट काॅमेडी का मजा उठा पाएंगे। मेरे लिए देखना दिलचस्प होगा कि दर्शकों की कसौटी पर यह कितना खरा उतर पाती है। लेकिन मौजूदा ट्रेंड देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना किसी बड़े बजट और बडे बैनर के भी ऐसी फिल्में भी लोगों पर अपना पैसा वसूल जादू चला देती हैं।

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